शनिवार, 13 जुलाई 2019

मेरे दोस्तो मैं सुमित बरनवाल


अपनी बहन "प्राची बरनवाल" की  कविता
  घर से बाहर पढ़ने जाने से पहले की  विचारों की हलचल आपके समक्ष प्रदर्शित कर रहा हूँ |

अच्छा लगे तो प्रतिक्रिया जरूर  दे।



हाँ! मैं जाने वाली हूँ.....
  नहीं! हमेशा के लिए नहीं
     नहीं ! विदा भी नहीं हो रही
          बस जाने वाली हूँ |


सपनों की शुरूआत होनी तो शुरू हुई है,
  पर एक नया गम भी मिलने वाला है।
    अब नये शहर में नये चहरे तो मिलेंगे,
       पर मेरा घर छूटने वाला है।

अरे दिवाली होली पर तो आऊँगी ही
   पर सिर्फ चार दिनो  के लिए |
       हाँ मिल भी लूँगी  सबसे
           बिना किसी को परेशान किये |

पहले लगता  था कि बस यहाँ से निकल जाऊँ,
  आखिर इस शहर में क्या रखा है।
      पर जाने से पहले ही  सब छूट  रहा ,
         अब ऐसा लगता है |
 
माँ पापा के बिना रहूंगी कैसे,
   सोच - सोचकर परेशन हूँ
      भाई  से आख़िर लडूंगी कैसे,
          जिसके बिना मैं  बेजान हूँ |

जानती हूँ , धीरे-धीरे सब  सही हो जाएगा
   पर अभी बड़ी बेचैनी  है |
       लेकिन कुछ दिनों तक अपनों से
            ये बिछरन तो सहनी है।


   हाँ! मैं जाने वाली हूँ ............ प्राची बरनवाल

Written by Prachi Baranwal